छात्र जो अपने पुरातन, दीखती छवि उनमें अपनी।
याद विद्यालय की करते, ध्यान सुकृतियों की अपनी।।
विविध क्षेत्रों में गए हैं, विविध देशों में रहे हैं।
वृत्ति की खातिर भले ही, बांह अपरों की गहे हैं।।
मातृ भू की याद आती, हृदय उनका छटपटाता।
लौट आ जाने को उत्सुक, हृदय में अति मोद आता।।
साथ में जो पढ़े साथी, मिलन को व्याकुल निगाहें।
रोक पाती नहीं उनको, भले हों विपरीत राहें।।
देश में ही रह रहे जो, नौकरी व्यापार कारण।
हृदय उनका भी मचलता, शोक कैसे हो निवारण।।
रास्ता देखें उन्हीं का, मिलन होगा साथियों से।
उल्लसित मन से प्रतीक्षा, मिलें कैसे साथियों से।।
आ गया अवसर मिले जब, हृदय सब के खिल गए।
वर्षों के बिछड़े साथी, के वि दो हलवारा में मिल गए।।
क्या सुखद दिन थे यहां के, साथ पढ़े और खेले।
यहीं रहकर ही सजाए, भविष्य के स्वप्नों के मेले।।
स्वप्न को साकार करने, विविध जगहों पर गए।
कुछ विदेशों में गए तो, कुछ यहीं पर ही रहे।।
किंतु दिल में रह गए थे, भूल हम पाए नहीं।
मजबूरियां कुछ रही ऐसी, मिल कभी पाए नहीं।।
केंद्रीय विद्यालय में आकर, याद आए भूले बिसरे।
बांह में अपने समेटा, जो अभी तक रहे बिखरे।।
भावना सद्भाव का ऐसा, जुड़ा कुछ ताना बाना।
दे गया अनुराग मिश्रित, प्रीति का अनुपम ख़ज़ाना।।
छात्र जो पढ़कर यहां से, विविध कार्यों में लगे हैं।
आज भी हम शिक्षकों के हृदय में उतने पगे हैं।।
आज भी सुनते या पढ़ते, देखते होते बड़े।
गर्व होता है हमें भी, सीढ़ियां उन्नति चढ़े।।
है यही इच्छा हमारी, हार्दिक अभिलाष है।
जब कभी भी मिले अवसर, आएं यहां यह आस है।।
हम करेंगे दिल से स्वागत, अपने पुरातन शिष्यों का।
हर्ष हमको बहुत होगा, दर्शन सुखद उन शिष्यों का।।
डॉ फूलचंद्र विश्वकर्मा, पूर्व शिक्षक
अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश